जड़ वाली सब्जियों की खेती कैसे करें, जानिए उपयोगी जानकारी

जड़ वाली सब्जियों में मूली, शलगम, गाजर और चुकंदर प्रमुख है| इनकी खनिज क्रियाओं में पर्याप्त समानता है, ये ठंडे मौसम की फसलें है और सभी भूमिगत होती है| जड़ वाली सब्जियों में हमें पौष्टिक तत्व, शर्करा, सुपाच्य रेशा, खनिज लवण, विटामिन्स एवं कम वसा प्राप्त होती है| इन जड़ वाली सब्जियों का उपयोग सब्जी बनाने हेतु, सलाद के रूप में एवं अचार के रूप में किया जाता है| गाजर का उपयोग रस के रूप में, मिठाई और मुरब्बा आदि बनाने में भी किया जाता है|

इनके पत्तों का प्रयोग सब्जी तथा सलाद के लिए व पशुओं के लिए हरे चारे के रूप में भी किया जाता है| चुकंदर का उपयोग चीनी और इथानोल बनाने में भी होता है| इन जड़ वाली सब्जियों के नियमित सेवन से शरीर में रोगों से लड़ने की प्रतिरोधक क्षमता का विकास होता है| गाजर तथा चुकंदर का सेवन रक्तवर्धक होता है| कम अवधि की फसल होने के कारण इन सब्जियों का फसल विविधिकरण में महत्वपूर्ण स्थान है| उत्तर भारत के मैदानी भागों में इन सब्जियों के जड़ उत्पादन (मूली, शलगम, गाजर एवं चकुंदर) हेतु निम्नलिखित बातों का ध्यान रखना चाहिए, जैसे-

किस्मों का चुनाव

जिन किस्मों की बाजार में मांग हो या जिन्हे किसान अपने लिए उगाना चाहता है, उन्हे प्राथमिकता दी जानी चाहिए| किस्म अच्छी पैदावार देने वाली और आपके क्षेत्र की प्रचलित हो, किस्म में रोग रोधिता, अगेतापन आदि वांछित गुण होने चाहिए, चुनी गई किस्म उस क्षेत्र विशेष की जलवायु के अनुकूल होनी चाहिए|

मूली की लम्बी व मध्यम जड़ वाली किस्में- पूसा देशी (अगस्त से सितंबर तक बुवाई के लिए उपयुक्त), (50 से 60 दिन में तैयार), जापानी सफेद (अक्टुबर से दिसंबर तक बुवाई के लिए उपयुक्त), पूसा हिमानी (दिसंबर से फरवरी तक बुवाई के लिए उपयुक्त), पूसा चेतकी (अप्रैल से अगस्त तक बुवाई के लिए उपयुक्त)

मूली की छोटी जड़ वाली किस्में- व्हाइट आइसिकिल, रैपिड रैड, व्हाइट टिप्ड, पूसा मृदुला (अक्टुबर से दिसंबर तक बुवाई के लिए उपयुक्त) (30 से 35 दिन में तैयार)|

गाजर की किस्में- जुलाई से बुवाई के लिए उपयुक्तपूसा वृष्टि (लाल) सितंबर से बुवाई के लिए उपयुक्त-पूसा रूधिरा (लाल), पूसा आसिता (काली), पूसा मेघाली (संतरी) अक्तुबर से दिसंबर तक बुवाई के लिए उपयुक्त, पूसा यमदाग्नि (संतरी), पूसा नयनज्योति (संतरी)|

शलगम की किस्में- पूसा श्वेती (सफेद जड़े, 45 से 50 दिन में तैयार, बुवाई अगस्त से सितंबर) पूसा कंचन (हल्की लाल जड़े, 50 से 55 दिन में तैयार, बुवाई सितंबर से अक्तूबर)|

पर्पल टोप व्हाइट ग्लोब (गोल उपर से बैंगनी जड़े, 60 से 65 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से जनवरी) पूसा स्वर्णिमा (हल्की पीतांबर जड़े, 60 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से दिसंबर तक) पूसा चन्द्रिमा (सफेद जड़े, 60-65 दिन में तैयार, बुवाई अक्तूबर से जनवरी)|

चुकंदर की किस्में- डैटरोय्ड डार्क रैड व करिमन ग्लोब (बुवाई सितंबर से दिसंबर तक)|

खेत की तैयारी एवं बीज बुवाई

इन जड़ वाली सब्जियों के उत्पादन के लिए ऐसी भूमि का चुनाव करना चाहिए, जिसमें पानी के निकास की उचित व्यवस्था हो और फसल के लिए प्रर्याप्त मात्रा में जैविक पदार्थ उपलब्ध हो| मिट्टी गहराई तक हल्की, भुरभुरी तथा कठोर परतों से मुक्त होनी चाहिए| इनकी फसल के लिए खेत सर्वोत्तम पी एच मान 6 से 7 होता है| खेत खरपतवारों और अन्य फसलों के पौधों से मुक्त होना चाहिए| खेत की मिट्टी रोगों एवं कीटों से मुक्त होनी चाहिए|

खेती की तैयारी- जड़ वाली सब्जियों हेतु एक जुताई मिट्टी पलट हल से 2 से 3 जुताई हैरो या कल्टीवेटर से करें| प्रत्येक जुताई के बाद सुहागा लगाएं, ताकि मिटटी भुरभुरी हो जाए| खेत की तैयारी के समय भली भांति सड़ी हुई गोबर की खाद 150 से 210 क्विंटल प्रति हेक्टेयर की दर से मिट्टी में मिलाई जाती है| खेत में प्रयोग के लिए खाद और उर्वरक की मात्रा का निर्धारण मिट्टी परीक्षण के आधार पर करना चाहिए| इन फसलों में 70 किलोग्राम नाईट्रोजन, 130 किलोग्राम यूरिया, 50 किलोग्राम फॉस्फोरस 310 किलोग्राम सिंगल सुपर फास्फेट, 40 किलोग्राम पोटाश और 25 किलोग्राम जिंक सल्फेट प्रति हेक्टेयर की दर से डालना चाहिए|

नाईट्रोजन की आधी मात्रा, फॉस्फोरस, पोटाश एवं जिंक सल्फेट की सम्पूर्ण मात्रा बुवाई हेतु खेत तैयार करते समय डालनी चाहिए। जबकि शेष बची नाईट्रोजन को जड़ बनने की स्थिती में मिट्टी चढ़ाते समय समान रुप से छिड़क देना चाहिए| इसके अतिरिक्त खड़ी फसल में आवश्यकतानुसार यूरिया का पर्णीय छिड़काव भी किया जा सकता है| बिजाई से पहले खेत से पिछली फसल के सभी अवशेषों को निकाल देना चाहिए|

बीज दर- जड़ वाली सब्जियों हेतु एक हेक्टेयर में बुवाई के लिए गाजर और शलगम में 4 से 5 किलोग्राम एवं मूली में 8 से10 किलोग्राम बीज का प्रयोग करते है| चुकंदर की एक अंकुर वाली किस्मों हेतु 6 किलोग्राम और बहु अंकुर वाली किस्मों हेतु 8 से 10 किलोग्राम बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करते है| बुवाई के लिए स्वस्थ और प्रमाणित बीज का ही प्रयोग करें| चयनित किस्म का शुद्ध बीज किसी अनुसंधान केन्द्र, बीज निगम, कृषि विश्वविद्यालय या सुस्थापित बीज फर्म से प्राप्त करना चाहिए|

बुआई और फसला- मूली और गाजर के बीज की बुवाई 40 से 45 सेंटीमीटर चौड़ी एवं 15 से 20 सेंटीमीटर उंची मेड़ों पर करते है और बीज को 1.5 से 2 सेंटीमीटर की गहराई पर लगाते है| जबकि शलगम और चुकंदर को समतल खेत में या मेड़ों पर 10 से 12 सेंटीमीटर उंचाई पर भी लगाया जा सकता है और बीज को 2 से 3 सेंटीमीटर की गहराई पर बोना चाहिए| बीजाई से पहले बीज को उपयुक्त कवकनाशी से उपचारित कर लेना चाहिए|

जड़ वाली सब्जियों हेतु बिजाई के समय मिट्टी में पर्याप्त नमी होनी चाहिए| बीज में अंकुरण 8 से 10 दिन में होता है| पहली सिंचाई बीज उगने के बाद करें, बीज जमाव के बाद जब पौधे 5 से 6 सेंटीमीटर लंबाई के हो जाए तब खेत में पौधों की वांछित संख्या रखने के लिए पौधों की छंटाई की जाती है| इसके लिए मूली और गाजर के प्रत्येक दो पौधों के बीच में 5 से 7 सेंटीमीटर एवं शलगम तथा चुकंदर के प्रत्येक दो पौधों के बीच में 8 से 10 सेंटीमीटर का अंतर रखकर फालतु पौधों को निकाल देते है|

सिंचाई प्रबंधन

जड़ वाली सब्जियों में पहली सिंचाई बीज बोने से पहले पलेवा के रूप में की जाती है| इसके उपरांत आमतौर पर दो से तीन सिंचाइयों की आवश्यकता होती है| जड़ वाली सब्जियों के लिए हल्की सिंचाई की आवश्यकता होती है| भारी और चिकनी दोमट भूमि में बोई गई फसल में टपक सिंचाई या फव्वारा सिंचाई का प्रयोग करना चाहिए| खेत में अनावश्यक पानी का रुकना पौधों की वृद्धि और विकास के लिए हानिकारक होता है|इसलिए जल निकास का उचित प्रबंधन होना चाहिए| जिससे पौधों की जड़ो के आसपास वायु का संचरण आसानी से हो सके|

खरपतवार प्रबंधन

जड़ वाली सब्जियों हेतु 2 से 3 बार निराई-गुडाई द्वारा खरपतवारों को हटाते है, खरपतवारों के रसायनिक नियत्रंण के लिए फलूक्लोरालिन (बासालिन 45 ई सी) का प्रयोग 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुआई के ठीक पहले मिट्टी में मिलाकर करते है या पेन्डीमेथालिन (स्टाम्प 30 ई सी) का प्रयोग 0.75 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से बुवाई के 2 दिन के अन्दर छिड़काव द्वारा करते है|

कीट और रोग प्रबंधन

आमतौर पर इन जड़ वाली सब्जियों फसलों में कीटों और रोगों का प्रकोप कम होता है| लेकिन जो प्रभावित करते है, वो इस प्रकार है, जैसे-

1. माहू या चेपा एवं फुदका पत्तियों व तनो से रस चुसते है| इनसे बचाव के लिए ईमिडाक्लोपरिड या थायामिथोक्साम 2 मिलीलीटर दवा प्रति 10 लीटर पानी की दर से छिड़काव करें|

2. पत्ती कुतरने वाले कीट से बचाव के लिए डाइमिथोएट 30 ई सी या मेलाथियान 50 ई सी दवा 1 से 2 मिलीलीटर प्रति लिटर पानी की दर से छिड़काव करें|

3. बीज, पौध और जड़ सडन रोग से बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा विरिडी 4 ग्राम या कार्बाडाजिम 2 ग्राम प्रति किलोग्राम बीज की दर से उपचार करें|

4. पत्ती धब्बा रोग से बचाव हेतु कार्बाडाजिम या मैंकोजेब के 0.25 प्रतिशत के धोल का छिड़काव करें|

जड़ों की पैदावार

किस्म के आधार पर मूली और शलगम में बुवाई के 50 से 60 दिन बाद एवं गाजर व चुकंदर में बुवाई के 90 से 120 दिन बाद जड़े बाजार में भेजने योग्य हो जाती है| चीनी उत्पादन हेतु चुकंदर की जड़े बुवाई के 150 से 170 दिन बाद निकाली जाती है| जड़ों को सुरक्षित निकालकर अच्छी तरह साफ करके बाजार में भेजना चाहिए| खाने योग्य जड़ों की पैदावार 200 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर प्राप्त होती है|

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